Sunday, November 25, 2007

आखरी अलविदा

रात कि इस महफिल में
गूँज रही है खामोशी
इस आलम कि ऐसी है मदहोशी
आज नशा भी नशे में हैं!!

इसी रोज़ आस्मान के तले
चांदनी के चादर ओढे

बैठा हूँ मैं---
तन्हा!
इतना तन्हा, जैसे तन्हाई ने साथ छोड़ दिया हो।
बेहिसाब ज़िंदगी के भागम भाग में
ज़िंदगी बहुत पीछे छोड़ गया हैं मुझे

अकेला!

दो आँखें आज नम नहीं
फिर भी पलकें भारी लग रहे हैं;
चेहेरें पे अभी हैं मुस्कान
लेकिन दिल में कुछ चुभ रही हैं
बेज़ुबान लव्ज़ आज कहना चाहता है, कुछ
गुम हो गया था जो सुर कभी
आज वही साज़ छेड़ना चाहता है यह मन

चूमना चाहता हूँ वोही होंठ
जिसपे कभी मेरा नाम नहीं आया
छोना चाहता हूँ वह बदन
जिसके लिए कभी तड़पा हैं मेरा यह जिस्म;
महसूस करना चाहता हूँ वोही सासें
वोही गर्माहट, जो कभी मेरा नहीं हो पाया
बेशुमार प्यार करना चाहता हूँ, एकबार-एक आखरी बार

साथ बिताये हुए उन्ही लम्हों में खो जान चाहता हूँ
न जाने वह लम्हे कब वापस आये?

शायद यह मेरा आखरी अल्विदा हो!







1 comment:

Kushal said...

one word-unparallel!!
honestly,i now feel inferior when it comes to comparing my article in hindi(if it ever comes) to this one..
and trust me,'picture abhi baaki hai'
adieu